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CJP Protest: Student Movement or Political Circus? | Explained | Jantar Mantar | Abhijeet Dipke

Shubhankar Mishra 12 views
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अच्छा जंतर मंतर पर कौकरोष के प्रोटेस्ट ने चात्रों के अंधोलनों कमजोर कर दिया?मतलब यह सवाल हमारे मन में इसलिए आ रहा है क्योंकि प्रोटेस्ट को देखने के बाद हमको यह समझ में नहीं आ रहा कि जंतर मंतर पर हो क्या रहा था?यह चात्र अंधोलन थ हम अपनी दिमान मांगने आए हैं, हमें धर्मेंद प्रदाम्द का दिमान मांगने हैं।कभी धपली वाला प्रोटेस्ट देखकर लग रहा था कि जेनियू कल रेगुलर प्रोटेस्ट हैं।कहीं पर राजनेतिक लोग नजर आ रहे थे।कहीं घरीब किसान नजर आ रहे थे� कौकरोश पार्टी के प्रवक्ता अपने पीछे चाचा को लेके उससे पंखा हिलवा रहे थे और बैट के कौफी पी रहे थे गर्मी सास नहीं ले पारे थे अमिरिका वाले भाईया भी दुचार घंटा बैट के सीधे एसी गाड़े में बैट गए फिर एक वीडियो में RSS मु कोई बुद्धजीवी आये वो समझाने लगे की एवियम को हैक किया सकता है तीन उसमें स्टेप होता है उससे आप हैक कर लीजीए और एक काम कीजिए वाइलेड पेपर से चुनाव करवा है एक आदमी लाल डायरी लेकर आ गया जो कह रहा है की ये संविधान है कै खोलो लाल �

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जिस कौकरोच मुवमेंड ने पूरे देश में तहलका मचा दिया था।वो सिख्षा मंतरी जिनकी अगवाई में इस देश में कितने ऐसे सिख्षा को लेकर कूविवस्थाएं हुईं उनके स्तीवे की मांग को लेकर एक बड़ा जनाकरोच दिखा बड़े हैरानी हुई कि उ आदे लोग अबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबब जिस मंच से पेपर लीग परिक्षा व्यवस्था और जवाब देही पर सवाल उठाना चाहिए था।जहांपर चात्रों को आगे करके चात्रों को आगे करके उनके माबाब को आगे करके मंच से कहना चाहिए था कि लाखों चात्रों और उनके परिवार महीनों नहीं सालों साल क्या ये अंधोलन चात्रों की आवास को मजबूत करने के लिए था या चात्रों की अंधोलन को कमजोर करने के लिए?जिस अंधोलन को उनकी आवास बनना था, वो कुछ लोगों के दिखासऔर शपास तक सीमित रह गया।और अगर अपने से कोई आदमी गया होगा तो उसने देखा होगा और जो नहीं गए वो वीडियोस देखकर समझ जाएंगे।

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यह पाँच मिन जंतर मंतर पर जो ख़ड़ा ह और इन छेहरों को देखकर सरकार को मौका मिल जाता है कहने का कि देखो उनकी वज़ा से परिक्षा विवस्था का सच में शोर दब गया प्रेस कॉंफरेंस में जो लड़का चार घंटा बैट के जान दे रहा था वो लोग जो सरकार को हिलाने की बात कर रहे थे उनतालिस डिग सच कहें तो जंतर मंतर पर आज राजनेतिक कारिकरता थे, सोशल मीडिया इंफ्लूइंसर थे, यूट्यूबर थे, कैमरे थे, पुलिस वाले थे, नारे थे, भाषर थे, सबके पास बोलने के लिए कुछ ना कुछ था, लेकिन वो लड़का जिसने सालों साल मेनट करके नीट कवो पिता जिसने कोचिंग फीज भरने के लिए कर्जा लिया था, पेपर कैंसल हो गया, अब कहाँ से पैसा लाएगा, उसकी बारे में कोई बात नहीं थी।वो मा जो दूआ कर रही है, प्राथना कर रही है, कि भाईया इक्जाम हो जाए, लड़का तयार बैठा है, भगवान बाइकी कुछ नहीं था।बाइकी जो लोग थे सबको दिखना था, छपना था, सबको बोलना था।और यहीं से सारी कहानी गड़ब।क्योंकि समस्य सिर्फ ये नहीं थी कि मंच पर कौन बोल रहा है, किसको छपास का शौक लगा है।

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सवाल ये था कि 22 मिलियन फॉलोवर को द चात्रों की समस्या, धरमेंदर प्रदान का इस्तीफा, ये सारे मसले जो थे सिक्षा व्यवस्था में जो कूवव्यवस्थाएं हैं, पेपर इमानदारी से हो, ये सारे मसले गायब हो गए।क्योंकि एक तरब बिहार में टीचर लोग मार किये हैं, टीचर वरसे टीचर, दिलमें ये तृपाथी हैं सरकार कह रही करो बजाओ ढोल अपनी अपनी जात का अपने अपने जंडे का और छातर यही कहानी है गुरू इसलिए आज आप सोचीएगा कि जंतर वंतर पर जो कुछ हाज हुआ उसने छातरो सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जुवाओं को पता है नहीं था कि जुवाई इसमें है।ना जुवाओं से पूछके मैनिफेस्टो, ना जुवाओं से पूछके प्रवक्ता, ना जुवाओं को शामिल करके अंधोलन।सिर्फ वही दो आईडॉलजी वाले।जेनू वालो को � 6 जून को लेकर excitement थी आज सबेरे जंतर मंतर की तस्वीर देखी आप जंतर मंतर पर सबेरे 8 बज़े से पतरकार जा थे प्रोटेस्टर कम थे भरे पड़े थे पतरकार पुलिस वाले भरे पड़े थे सरकार भी आज उश्यारी में बैटी थी सबको अपना वो औरेंज जर्सी प

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चात्र नहीं थे क्योंकि चात्रों को इसमें शामिल किया ही नहीं गया था रील की क्रांटी सडक की क्रांटी का अंतर आज दिखाई पड़ा रील की क्रांटी में करोडों लोग थे लेकिन जंतर मंतरी क्रांटी ह जमीन पर आ रहा था क्या फॉलोवर्स ने स्क्रीन पर साथ दिया लेकिन सडग पर नहीं या इसमें फॉलोवर्स को शामिल ही नहीं किया गया तो जानते कहां से आते कहां से लेकिन आज इस घटना ने बताया कि रेल पर सरकार गिराना आसान है उन तालिस दिगरी की धूप में उनको अमेरिका से यहाँ आने पर इंडियन क्रिकेट टीम के जर्सी चाहिए थी।वैबो सुर्वनशी बन के मैच खेलने सासुर जा रहे थे।और दुसर के वो भाईसाब, लॉयर साहब, वे जोन नीट परमिशन, हाथ में कॉफी लिये हैं पीछे से अच्छा।आधे अंधऔर फिर धीरे से निकल गए साइट से पीछे से कोई बोलना चाहा है इनके साथ वाला है तुम नहीं बोलोगे वही बोलें उनको ही दिखना चाहिए अरे देखो भाईसाब भीड सब कुछ नहीं होती है किसी आंधोलन की ताकत खाली भीड नहीं होती है अगर सौ लोग भी सही ह दो चार लोग आये थे, एक आंटी जी आयी थी जो अपनी बेटी को लेकर आयी थी जिनोंने कहा, मेरी बेटी नैंथ में है और मैं चाहती हूँ कि एडुकेशन सिस्टम गडबड है हम भी कह रहे हैं भाई, एक बहुत गडबड है यार स्कूल में पीस बच्चा एड्मिशन कर तो जब आप जंता को असली आदमी जिसके लिए मामला था उसको इंवाल भी नहीं करेंगे तो वो भी नहीं आया वो भी खाली फॉलोवर बनकर रह गया समर्थक नहीं बना उसने भी इंटरनेट पर जो तुमने सही पोस्ट की लाइक कर दिया बाई का भाड़ बजाओ और आ� हमको वहाँ पर आमार्दी पार्टीलोग दिखाई पड़े, कॉंग्रेसी दिखाई पड़े, अक्टिविस्ट दिखाई पड़े, अंधूलन जीवी दिखाई पड़े कुछ बीजेपी के भी साइट प्रोड़ेक जो थे के बीच में पेपर देने जा रहा था वो हमको नहीं दिखाई पड़ा वो नहीं थे यहाँ पे और सवाल यही है कि जिन चात्रों के नाम पर अंधुलन था वो कहा थे क्योंकि जंतर मंतरी कहानी का सबसे परिशान करने वाला हिस्सा वही है वो भीर नहीं असली चात्रों का घा 9th वाले बच्ची हुँगे दिल्ली में जो चले आये कुछ कोचिंग सेंटर वालों ने आये कर दिया कि इरान की लड़ाई है चले जाओ लेकिन जिनका असली नुखसान था वो यहाँ नहीं है अब आप साथ आप खुद सोच के देखो यार एक बार अगर बंच पर ख़ड़ा अइसे पचास लड़के होते हैं मैं नहीं कहा रहा हूँ 10 ,000 लड़के होते हैं पचास लड़के होते हैं

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असली में पेपर देने वाले होते और वो यह बात कह रहे होते आप यकीन मानों शाम को सरकार हिल जाते हैं परिशान हो जाते हैं लेकिन जब मंच पर चात्रों से ज़ादा छ अगर इस मंच पर चर्चा, पेपर, लीक, परेक्षा, सुधार, जवाब, देही पर होती तो क्या तस्वीर होती।समस्या यही है कि बहस धीरे धीरे चात्रों से अटकर प्रदर्शन कारियों पर हो गई।और जैसे ही हुआ, आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत कमसुर्फ।यह जो लोंडे कॉकरोच का मास लाका थे, कह रहा है कि हम 15 रुपे बनाये थे और 30 रुपे बेद दे रहे हैं।एक कह रहा है हम टीशेट लाये थे, 25 टीशेट नुटा दिये।पर आज भी अपना अपना एजंडा लेक पहुंचा था. LGBTQ वाले अपना समाज आगे बढ़ गिया है अरे भईया जिस सिक्षा मंतरी के स्तीफे की मांग को लेकर अंधोलन खड़ा हुआ उसका ससुरो तुमको नाम नहीं पता था

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क्योंकि वहाँ पर असली बच्चों को तुमने बुलाया ही नहीं।तुमने उनको शामिल ही नहीं किया।ना अपने प्रवक्ता बनाने में, ना उनकी समस्याओं को हाईलाइट करने में, ना मंच से उनके विजार रखने में, ना म चर्चा चात्रों से हटी और जैसे किस चात्र अंदोलन में चात्र पीछे हुए खतम कहानी और बाकि सोशल मीडिया का जो महाल तब 22 मिलियन का उसमें CGP अपनी हाइप का शिकार हुए।और CJP अपनी हाइप का शिकार हुए।हाँ यह सवाल उठेगा कि क्या CJP यानी कौकर क्योंकि पहली बार जब सुप्रीम कोड़ से टिपड़ी आयी तो बड़ा तकलीफ हुआ था कि यार इतना रोज पेपर लीख होता बिहार से लेकर राजस्थान तार राजस्थान के एक ही सेंटर में सारे टॉपर निकल आय थे पढ़ाय लिखाई का मतलब क्या रह गया नौकर इन फॉलोवर्स को इन लोगों के लिए।समर्थक नहीं बनाया क्योंकि अमेरिका वाले बाबू से लेकर वो जो कॉफी वाले भाईया थे पीछे से पंखा हिल वा रहे थे और वो एंटी ब्रामिन वहाँ जो थे इन्होंने अपने आपको चमकाने फोकस आधा रखते इनको ल रील पे मूठा चलाना और सडग पे कदम बढ़ाना दो बहुत अलग चीज़ हैं।

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हो सकता कोई आपका रोज वीडियो देखता है।पर आपके लिए ख़ड़ा हो जाये, आपके ख़ाबने आजाये, घंटा।बहुत बार ऐसा होता है।आदमी का दिल से connection हो जाये, दिल से � और पहली बार ये सवाल पूछा गया कि आखिर सोशल मीडिया की ताकत का असली आकार क्या है?क्या वो उतनी बड़ी है जो तरह स्क्रीन पर दिखाई देती है?या उसका अफ़र सर्फ मॉबाईल तक सीमित है?

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और यही वो सवाल था जिसने आंदोलन की दिशा बदलनी शुर�मालीजे लाखो लोग भी आते हैं तो क्या न्याई मिल जाता है?चात्रों को भीर नहीं चाहिए था आज चात्रों को चाहिए था कि सिर्फ इमानदारी से उनके मुद्दे उठा लिये चाहें बाकि कोई नोटंकी ना चलें उन्हें जवाब चाहिए था चात्र ये चाहते थे क और 6 जुन के बाद यही हुआ है।पूरे दिन पेपर लीक से आदा वाइरल वीडियो थे नोटंकी के।पंखा जहलना, थंडी कॉफी पीना, एसी कार की तरफ जाना, किसी का अपना प्रोटेस, तुम सारी काहे पहने हो, 15 रुपे एक मास, 30 रुपे में क्यूं, अमित प्रध चार घंटा गर्मी नहीं जहिल पाए।तुम सरकार हिलाने वाले थी।

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तुम खोद हिल गए।तबयत खराब होके तुमारे चला गया।और VIP प्रोटेस्ट करोगे आम लड़कों के लिए।उज़े लड़का जिसकी तुम लड़ाई लड़े तुमको उसकी कहानी पता है।सत्तू पीके यहां से आंद्रपृदेश तो जाता है पेपर देने एक कमरें चार लोंडा रहता है जाएँ पंखा चलता है गर्मिक दिन में कोचिंग सेंटर के आसपास किसी सडी से गली में रहता है ताकि आने जाने भाड़ा ना देना पड़े होली, दिवाली, छट, बर और पीछे से एक लड़का आ रहा था वो बोल रहा था उसके लिए तुम चुप रहो बोल रहे न वो बोलने दे उनको अरे वो important नहीं है भाई वो लड़का important है और इसी वज़ासे आज चर्चा पंखे की है कॉफी की है एसी कार की है जिस दिन आंधोलन का मज़ाक उसके मुद इस आंदोलन का लक्ष साफ था कि सरकार पर दबाव बनाया जाया सिक्षा मंतरी पर दबाव बनाया जाया इस तीफे की बात थी परिक्षा व्यदस्था पर सवाल उठाना लेकिन 6 जून को शाम तक की तस्वीर उल्टी थी सरकार सवालों के घेरे से निकल रही थी आंदोलन स

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सरकार के समर्थक आंदोलन का मजाक उड़ा रहे हैं विरोधी के पास भचाउ करने कुछ नहीं है आज हमने देखा वारफा खानुं गई थी वो तो सरकार के धुर विरोधी है वो भी कह रहे थी कि आज हजार आदमी नहीं मिलने हैं दू परसेंट भी नहीं है टॉंग्रेस वा जितने यहाँ पर प्रोटेस्टर नहीं है उसे या तो सोशल मीडिया क्रियेटर आए हैं एंटरव्यू करने वाले आए हैं क्योंकि छात्र को इसमें शामिल ही नहीं कहता चात्र वही है उसके मन में अभी भी सवाल है परिक्षा व्यवस्थम सुधार कम होगा उसके नाम पर र अगर पूरे दिन सिर्फ नीट और CBC के चात्र बोलते, अगर माता, पिता अपनी कहानी सुनाते, अगर पेपर लीक से प्रभावत परिवारों को सामने लाया था, अगर हर वक्ता से सिर्फ एक सवाल पुछाता की चात्रों को न्याय कभ मिलेगा, अगर पूरा फोकस से सक्षा और इसलिए शाड़िस घटनाकरम से सीख मिलती है कि अगर भविश में कोई चात्र अंदोलन होता है, तो भी यूट्यूब करते हैं।रखना माता पिता रखना उनको रखना जो पेपर लीग से प्रभावित होए और चर्चा सिर्फ इसपे रखना चात्रों को नयाय का मिलेगा फोकस साफ होगा तभी दवाव बसमुत होगा बाकी चात्र मजबूत हुआ या कमजोर कि एक तरफ टीचर लडबर पड़े एक तरफ टीवी आंकर वरसे टीचर हो गया इधर यहाँ जंतर मंतर पर आंधोलन नौटंकी में तबदील हो गया चात्रों के मुद्दे मीम्स बनकर ट्रेंड हो गये मन चात्रों का था वो नहीं रहे बाके सब � आमाद्मी पार्टी, Congress, ये वाले सर, वो वाले सर, ये वाली एंकर, हमारी सरकार, तुमारी सरकार. हमी लड़ते हैं, हमारे ही बच्चे मरते हैं, हमी मरते हैं. भीड में, कभी परिक्षा में, कभी रोज मर रहा है सद्गे. जय शेरा.

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